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हिंदी के प्रसून और बहका-बहका मैं

Posted On: 1 Apr, 2011 Others में

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“सलीके से कपड़े में, टी-शर्ट और जिंस में, कलाई में वो बिंदास सी दिखने वाली वो घड़ी और हाथ में ब्लैकबेरी, इन सबके साथ जब जुबां से निकले अपनी हिंदी तो रहा न जाए..जुबां से निकल ही पड़ता है तुम ही हो मेरी हिंदी।“
वाइड स्क्रीन पर हिंदी को एक नए अंदाज में पढ़कर और सुनकर अच्छा लगता है, ऐसा लगता है मानो आंगन की रौनक दिन दूनी चार गुनी हो गई है। लंदन से मुंबई और पटना से देहरादून की दूरी सिमटती दिखती है। मैं कुछ पल के लिए एड लिखने लगता हूं, कुछ पल के लिए गीतों को पन्नों पे उकेरने लगता हूं और अगले ही पल सुदूर देहात में 10-20 बच्चों को पढ़ाने लगता हूं। आगे परती जमीन पर गुलाब के पौधों को सिंचने लगता हूं।
शहर से दूर एक गांव को एक मुक्कमल गांव बनाने में जुट जाता हूं। ये सब मैं हिंदी की बदौलत करता हूं। मेरी यूएसपी हिंदी ही है, जो मेरे लिए पैसे जुटाती है, हिंदी जो मुझे अच्छे ख्याल देती है, हिंदी जो मेरे सपनों को हकीकत में ढालती है। मेरे लिए हिंदी प्रसून हैं, मेरे लिए हिंदी गुलजार हैं और इन सबसे बढ़कर मेरे लिए हिंदी रेणु हैं। दिल्ली के ली मेरेडियन में थ्री पीस में भी हिंदी बोलना, जहां सब हिंदी जानते हैं, हिंदी के प्रसून को अच्छा लगता है लेकिन जो हिंदी नहीं जानते हैं उन्हें हिंदी के प्रसून अंग्रेजी में भी बताते हैं, यही हैं हिंदी के हम। वो गलत को गलत कहते हैं और सही को सही। कोई मिलावट उन्हें रास नहीं आया, यही वजह है कि वे कहते हैं सिर उठा के जियो।

उन्हें बोलचाल की हर विधा में दखल पसंद है, वो चाहे अंग्रेजी हो या हिंदी लेकिन मिलावट एकदम पसंद नहीं। उन्हें जिद्दी लोग पसंद हैं, जिद्द जो जीने के लिए बेहद अहम है। भावनाओं में कोई त्रुटि नहीं होती क्योंकि उसमें किसी तरह का अवरोध नही होता लेकिन इसके लिए जिद्दी होना पड़ता है। मुझे पता है कि जिद्दी होना कभी-कभी महंगा भी पड़ता है लेकिन मैं जिद्द से जुड़ गया हूं, मंजिल तक पहुंचने के लिए न कि खोजने के लिए। मै भूले बिसरे शब्दों को इकट्ठा कर रहा हूं, उसे सहेज रहा हूं। मैं गुनगुनाना चाहता हूं-
तुम बेवजह परेशान हो,
परेशानी की भी क्या यह कोई वजह है?
आओ, देखो मैं क्या कर रहा हूं,
देखो न, यहां पहले लोग बोलने से डरते थे,
आज वो दिल की बातें खुलकर बोल रहे हैं।
वो, जो काली फ्रॉक में लड़की दिख रही है न,
पहले लिख नहीं पाती थी, लेकिन आज
वह लिखती है, उसने दिल की बातें लिखी है।
तुम बेवजह परेशान हो, मैं अब यहीं खुश हूं..
अब यहां सड़क पहुंच गई है, कभी-कभी बिजली भी आ जाती है,
धूल कम उड़ती है यहां,
लोग पहनावे से नहीं पहचाने जाते यहां,
अंग्रेजी बोलने वाले और हिंदी बोलने वाले
दोनों ही यहां बराबर समझे जाते हैं यहां,
परेशानी की भी क्या यह कोई वजह है?


(इसे लिखते हुए कई चीजें सामने दौड़ रही थी, मन तो छलांगे लगा रहा था। एक शब्द पर रुकने से दूसरा शब्द नाराज हो जाता था, इसलिए यहां स्थिरता का अभाव है, अस्थिर मन की स्क्रिप्ट )

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

SUJEET JHA के द्वारा
April 16, 2011

आज आप के ब्लॉग के कुछ पन्ने उलटे .रेनू जी ,और अन्य लेख पढ़कर अच्छा लगा .काश इस भाग दौड़ भरी जिन्दगी से कुछ पल फुरसत के मिल जाएँ तौ क्या बात हो.

sanjeev sharma के द्वारा
April 14, 2011

“लोग पहनावे से नहीं पहचाने जाते यहां, अंग्रेजी बोलने वाले और हिंदी बोलने वाले दोनों ही यहां बराबर समझे जाते हैं यहां, परेशानी की भी क्या यह कोई वजह है?” ….आपकी इन लाइनों में पुरे लेख का मर्म छिपा है.उम्दा प्रस्तुति के लिए बधाई…साथ ही सप्ताह का ब्लागर बन्ने पर भी..मुबारकवाद

saleem Khan के द्वारा
April 13, 2011

ये सब मैं हिंदी की बदौलत करता हूं।

priyasingh के द्वारा
April 10, 2011

हिंदी के बारे में लोग बहुत बाते करते है की इसे कैसे आगे बढ़ाना चहिये कैसे प्रचार प्रसार करना चाहिए … आदि आदि पर आपने जिन सरल शब्दों में अपनी बात लिखी है उसे पढ़कर मन बाग़ बाग़ हो गया………… मै भूले बिसरे शब्दों को इकठ्ठा कर रहा हूँ उसे सहेज रहा हूँ मै गुनगुनाना चाहता हूँ …………. बहुत सुन्दर शब्द….

Rajkamal Sharma के द्वारा
April 8, 2011

इस हफ्ते का सुपरस्टार बनने की बहुत -२ बधाई

Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
April 8, 2011

बहुत सुंदर | बधाई |


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